बकरी पालन: ग्रामीण और शहरी उद्यमिता के लिए सुनहरा अवसर परिचय 2025

बकरी पालन

बकरी पालन – भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की अधिकांश जनसंख्या आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और अपनी आजीविका के लिए कृषि व पशुपालन पर निर्भर करती है। इन पशुपालनों में बकरी पालन (Goat Farming) एक ऐसा व्यवसाय है जो कम लागत, कम स्थान, कम श्रम और अधिक लाभ प्रदान करता है।
बकरी को आमतौर पर “गरीब आदमी की गाय” कहा जाता है, क्योंकि यह छोटे किसानों और भूमिहीन परिवारों के लिए आजीविका का प्रमुख साधन रही है।

आज के समय में बकरी पालन सिर्फ ग्रामीण स्तर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शहरी इलाकों में भी लोग इसे व्यावसायिक तरीके (Commercial Goat Farming) से अपनाने लगे हैं।

भारत में बकरी पालन का महत्व

  • भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ बकरियों की संख्या सबसे अधिक है।
  • देश में लगभग 14 करोड़ से अधिक बकरियाँ पाई जाती हैं।
  • भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बकरी मांस उत्पादक देश है।
  • ग्रामीण परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा बकरी पालन से आता है।
  • बकरी का दूध, मांस और खाल की मांग भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है।

बकरी पालन से प्राप्त उत्पाद:

  • दूध – पौष्टिक, आसानी से पचने योग्य और औषधीय गुणों से भरपूर।
  • मांस – भारत में सबसे अधिक खाया जाने वाला मांस।
  • खाल – चमड़े के उद्योग में प्रयुक्त।
  • गोबर और मूत्र – जैविक खाद व कीटनाशक के रूप में उपयोग।

बकरी की प्रमुख नस्लें

  • बकरी पालन में सही नस्ल का चुनाव सफलता की कुंजी है।

भारतीय नस्लें:

  • बरबरी बकरी – दूध और मांस दोनों के लिए उपयुक्त।
  • बीटल बकरी – पंजाब में पाई जाती है, दूध उत्पादन में अच्छी।
  • जमुनापरी – उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध नस्ल, बड़ी कद-काठी, दूध व मांस दोनों के लिए।
  • सिरोही बकरी – राजस्थान की नस्ल, शुष्क व गर्म इलाकों के लिए सर्वश्रेष्ठ।
  • ब्लैक बंगाल – पश्चिम बंगाल की नस्ल, मांस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध।

विदेशी नस्लें:

  • टोग्गेनबर्ग
  • साहिवाल (Saanen) – दूध उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ।
  • न्यूबियन बकरी – मांस और दूध दोनों के लिए उपयुक्त।

बकरी पालन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ

शेड (Goat Shed)

  • बकरियों के लिए हवादार, सूखा और साफ-सुथरा स्थान होना चाहिए।
  • शेड को ऊँचाई पर बनाया जाए ताकि बरसात का पानी अंदर न जाए।
  • एक बकरी के लिए कम से कम 10-12 वर्ग फुट जगह चाहिए।

आहार एवं चारा

  • हरा चारा: बरसीम, नेपियर घास, ज्वार, बाजरा।
  • सूखा चारा: भूसा, चोकर।
  • अनाज: मक्का, जौ, गेहूँ।
  • खनिज व विटामिन सप्लीमेंट देना आवश्यक है।

पानी की व्यवस्था

  • बकरियों के लिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता 24 घंटे होनी चाहिए।

स्वास्थ्य देखभाल

  • समय-समय पर टीकाकरण और दवाइयाँ।
  • खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों से बचाव।
  • पशु चिकित्सक की नियमित जाँच।

बकरी पालन की विधि

  • पारंपरिक पालन – खुला चरागाह आधारित।
  • अर्ध-गहन पद्धति – चरागाह + आहार दोनों का मिश्रण।
  • गहन पद्धति (Commercial Farming) – पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से पालन।

निवेश और लागत

  • बकरी पालन में निवेश इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी बकरियाँ पालना चाहते हैं।
  1. उदाहरण (50 बकरियाँ + 2 नर):
  • बकरी खरीद – ₹2,50,000 (प्रति बकरी ₹5000)
  • शेड निर्माण – ₹1,00,000
  • चारा व दाना – ₹1,20,000 (वार्षिक)
  • दवा व देखभाल – ₹30,000
  • अन्य खर्च – ₹20,000
  • कुल लागत = ₹5,20,000 (लगभग)

लाभ:

  • दूध, मांस और बच्चे बेचने से सालाना आय ₹7–8 लाख तक हो सकती है।
  • यानी एक साल में 2–3 लाख का शुद्ध लाभ संभव है।
  • सरकारी योजनाएँ व सब्सिडी
  • भारत सरकार और राज्य सरकारें बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएँ चला रही हैं:

NABARD बकरी पालन ऋण योजना

  • पशुपालन विभाग द्वारा सब्सिडी (30% – 50% तक)
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना (PMEGP)
  • राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM)

बकरी पालन में आने वाली चुनौतियाँ

  • बीमारियों का खतरा।
  • बाजार तक पहुँच की कमी।
  • शुरुआती निवेश का अभाव।
  • प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी।

बकरी पालन के लाभ

  • कम लागत में अधिक मुनाफा।
  • छोटा व्यवसाय होने पर भी परिवार की आजीविका के लिए पर्याप्त।
  • जैविक खाद का उत्पादन।
  • दूध और मांस दोनों की हमेशा मांग।
  • ग्रामीण बेरोजगारी में कमी।

भविष्य की संभावनाएँ

  • भारत में बढ़ती जनसंख्या और मांस/दूध की मांग के कारण बकरी पालन का भविष्य उज्ज्वल है।
  • बकरी का मांस भारत में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है।
  • विदेशों में भी भारतीय बकरी का मांस व दूध निर्यात किया जाता है।
  • आने वाले समय में बकरी पालन से रोजगार व निर्यात दोनों की संभावनाएँ बढ़ेंगी।

निष्कर्ष

बकरी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जो न केवल ग्रामीण किसानों की आय बढ़ाता है, बल्कि रोजगार सृजन और पोषण सुरक्षा में भी मदद करता है। सही नस्ल, सही प्रबंधन और सरकारी सहायता से यह व्यवसाय किसी भी किसान या उद्यमी को आत्मनिर्भर बना सकता है।